1। बिश्व में, भारत में सर्वाधिक डायबिटीज़ के मरीज हैं
एक रिसर्च के अनुसार साल 2000 के अनुमान के मुताबिक विश्व में करीब 17 करोड़ डायबिटीज़ के मरीज थे, जिसमे की भारत में करीब 3 करोड़ डायबिटीज़ के मरीज थे जो की सबसे ज्यादा था
उसी रिसर्च में यह भी अनुमान किया गया है की अगले तीस साल में भी भारत में सबसे अधिक डायबिटीज़ के मरीज रहेगा अनुमान के अनुसार साल 2030 में विश्व में करीब 36 करोड़ डायबिटीज़ के मरीज होंगे, जिसमे की भारत में करीब 8 करोड़ डायबिटीज़ के मरीज होंगे जो की सबसे ज्यादा होगा
अभी के हाल में भारत में चीन से 1.5 गुणा अधिक, अमेरीका से 2 गुणा अधिक और इंडोनेशिया से ४ गुणा अधिक है साथ ही २०३० साल तक में भारत में २.५ गुणा अधिक मरीज हो जायेंगे
2. अधिक जानकारी के लिए
http://www.who.int/diabetes/facts/en/diabcare0504.pdf
मंगलवार, 18 अगस्त 2009
आस्थमा
1. आस्थमा किन चीजों से होता है?
आस्थमा (दमा, हफनी) का बीमारी हमेशा के लिए होता है यह कभी खत्म नहीं होता है, किंतु अपना ध्यान रखने से आप अपने या अपने सगे संबन्धी के आस्थमा को नियंत्रण में रख सकते हैं घर और बाहर में अनेक चीज होती हैं जिनके कारण आस्थमा चालू हो सकता है ये कारक नीचे दिए गए हैं
1.1 हवा में प्रदूषण सबसे मुख्य कारण है
जैसे की गाड़ियों से निकलता धुआं
धुम्रपान करते हुए व्यक्ति के साथ रहना इसीलिए घर में कोई भी धूम्रपान करे, असर सब पर पड़ता है
वसंत ऋतू में जब नए फूल निकलते हैं, तो उसके पौलन या फूलों के पराग से अस्थमा हो सकता है
गर्दा से
सेंट, परफ्यूम, डियोडोरेंट, जेल, क्रीम, लोशन, स्प्रे, साबुन इत्यादी के गंध से
तेल युक्त पेंट से (Paint)
1.2 बाहर के वातावरण में बदलाव से
ठंडा हवा में सांस लेना
1.3 गहरा सांस लेने से, जैसे की
व्यायाम से या बच्चे को खेलने से भी अस्थमा हो सकता है जिस बच्चे को आस्थमा के कारण खेलने में दिक्कत होता है, उसे खेल से आधा घंटा पहले दवा लेना चाहिए ध्यान रहे की रोजाना व्यायाम या खेलने से आस्थ्मा कम हो सकता है
1.4 मन के भावना से
आपके मन के भावना का आस्थमा पर बहुत असर होता है। किसी भी आवेश या उत्तेजना से, दमा के मरीज में, आस्थमा अटैक हो सकता है। जैसे कि अधिक हँसने से, रोने से, गुस्सा से या अन्य किसी भावना से अधिक तेज से सांस लेने से, आस्थमा हो सकता है।
1.5 घर के अन्दर प्रदूषण से
घर में भींगा होने पर दीवारों पर मोल्ड (Molds) या फंगस लग जाने पर
घर में पालतू जानवर (कुत्ता, बिल्ली) के बाल, थूक और पेशाब से, ख़ास करके अगर कोई बच्चा उस जानवर से बहुत खेलता है
तिलचट्टा के खाल से (Cockroach), छोटे कीटाणु से (House Dust Mite)
खाने में कोई पदार्थ से जैसे की पैकेट में रखे खाने के साथ अन्य मिलावट जो की उस खाने को ख़राब होने से बचाता है
खाना से एलरजी से जैसे की दूध, अंडा, श्रिम्प मछली, मूंगफली
कोई दवा से, जैसे की सिरदर्द का दवा इबुप्रोफेन (Ibuprofen) या अस्पिरिन (Aspirin), संक्रमित बीमार के लिए पेनीसिल्लिन (Penicillin), दिल के रोग के लिए बीटा ब्लोकर (Beta Blocker)
1.6 बीमारी से
कोई नाक, कान, गला या सांस के नली के बीमारी से
खट्टा ढकार आने पर, पेट से आधा-पचा हुआ खाना गर्दन तक आ सकता है, और फेफड़ा में जा सकता है। यह भी आस्थमा का कारण हो सकता है। इसको गस्ट्रो-इसोफेजियल रिफल्क्स (Gastro-esophageal reflux disorder or GERD) कहते हैं।
1.7 होर्मोंस के बदलाव से
होर्मोंस के बदलाव से लड़की में आस्थमा हो सकता है, जैसे की मासिक धर्म के समय या गर्भ के दौरान
Asthma Metered Dose Inhalers आस्थमा का मिटरड डोज़ इनहेलर
आस्थमा (दमा, हफनी) का बीमारी हमेशा के लिए होता है यह कभी खत्म नहीं होता है, किंतु अपना ध्यान रखने से आप अपने या अपने सगे संबन्धी के आस्थमा को नियंत्रण में रख सकते हैं घर और बाहर में अनेक चीज होती हैं जिनके कारण आस्थमा चालू हो सकता है ये कारक नीचे दिए गए हैं
1.1 हवा में प्रदूषण सबसे मुख्य कारण है
जैसे की गाड़ियों से निकलता धुआं
धुम्रपान करते हुए व्यक्ति के साथ रहना इसीलिए घर में कोई भी धूम्रपान करे, असर सब पर पड़ता है
वसंत ऋतू में जब नए फूल निकलते हैं, तो उसके पौलन या फूलों के पराग से अस्थमा हो सकता है
गर्दा से
सेंट, परफ्यूम, डियोडोरेंट, जेल, क्रीम, लोशन, स्प्रे, साबुन इत्यादी के गंध से
तेल युक्त पेंट से (Paint)
1.2 बाहर के वातावरण में बदलाव से
ठंडा हवा में सांस लेना
1.3 गहरा सांस लेने से, जैसे की
व्यायाम से या बच्चे को खेलने से भी अस्थमा हो सकता है जिस बच्चे को आस्थमा के कारण खेलने में दिक्कत होता है, उसे खेल से आधा घंटा पहले दवा लेना चाहिए ध्यान रहे की रोजाना व्यायाम या खेलने से आस्थ्मा कम हो सकता है
1.4 मन के भावना से
आपके मन के भावना का आस्थमा पर बहुत असर होता है। किसी भी आवेश या उत्तेजना से, दमा के मरीज में, आस्थमा अटैक हो सकता है। जैसे कि अधिक हँसने से, रोने से, गुस्सा से या अन्य किसी भावना से अधिक तेज से सांस लेने से, आस्थमा हो सकता है।
1.5 घर के अन्दर प्रदूषण से
घर में भींगा होने पर दीवारों पर मोल्ड (Molds) या फंगस लग जाने पर
घर में पालतू जानवर (कुत्ता, बिल्ली) के बाल, थूक और पेशाब से, ख़ास करके अगर कोई बच्चा उस जानवर से बहुत खेलता है
तिलचट्टा के खाल से (Cockroach), छोटे कीटाणु से (House Dust Mite)
खाने में कोई पदार्थ से जैसे की पैकेट में रखे खाने के साथ अन्य मिलावट जो की उस खाने को ख़राब होने से बचाता है
खाना से एलरजी से जैसे की दूध, अंडा, श्रिम्प मछली, मूंगफली
कोई दवा से, जैसे की सिरदर्द का दवा इबुप्रोफेन (Ibuprofen) या अस्पिरिन (Aspirin), संक्रमित बीमार के लिए पेनीसिल्लिन (Penicillin), दिल के रोग के लिए बीटा ब्लोकर (Beta Blocker)
1.6 बीमारी से
कोई नाक, कान, गला या सांस के नली के बीमारी से
खट्टा ढकार आने पर, पेट से आधा-पचा हुआ खाना गर्दन तक आ सकता है, और फेफड़ा में जा सकता है। यह भी आस्थमा का कारण हो सकता है। इसको गस्ट्रो-इसोफेजियल रिफल्क्स (Gastro-esophageal reflux disorder or GERD) कहते हैं।
1.7 होर्मोंस के बदलाव से
होर्मोंस के बदलाव से लड़की में आस्थमा हो सकता है, जैसे की मासिक धर्म के समय या गर्भ के दौरान
Asthma Metered Dose Inhalers आस्थमा का मिटरड डोज़ इनहेलर
सोमवार, 17 अगस्त 2009
स्ट्रोक होने से कैसे बचा जा सकता है?
इसके लिये आप अपने जीवन में कुछ परिवर्तन कर सकते हैं।
कृपया देखें :-
देखें लाईफस्टायल मोडिफिकेशन (Lifestyle Modification)
कृपया देखें :-
देखें लाईफस्टायल मोडिफिकेशन (Lifestyle Modification)
क्या स्ट्रोक के लिये कोई दवा होता है?
स्ट्रोक के लिये एक दवा उपलब्ध है, जिसे टी पी ए (tPA or tissue plasminogen activator) कहते हैं। लेकिन यह दवा सभी जगह उपलब्ध नहीं होता है, और यह पहले कुछ घंटे में ही काम करता है।
स्ट्रोक पहचानने पर आप क्या कर सकते हैं?
आपके तुरंत सहायता से किसी व्यक्ति के दिमाग को बचाया जा सकता है।
और लोगों से सहायता मांगने के लिये जोर से आवाज दें
मरीज को लिटा दें, और उसका सिर उपर रखें, कि सिर में से खून का दवाब कम हो।
आप या कोई और, तुरंत किसी अस्पताल को ले जायें या किसी एंम्बुलेंस का इंतजाम करें।
और लोगों से सहायता मांगने के लिये जोर से आवाज दें
मरीज को लिटा दें, और उसका सिर उपर रखें, कि सिर में से खून का दवाब कम हो।
आप या कोई और, तुरंत किसी अस्पताल को ले जायें या किसी एंम्बुलेंस का इंतजाम करें।
स्ट्रोक को कैसे पहचाने?
स्ट्रोक के पांच चिन्ह होते हैं। ये अमेरिकन स्ट्रोक एस्सोसियशन द्वारा प्राकाशित किये गये हैं। इसके द्वारा आप कभी भी, कहीं भी, किसी को स्ट्रोक होते हुये पहचान सकते हैं। इससे आप उस मरीज को तुरंत अस्पताल पहुंचा कर बचा सकते हैं। ध्यान रहे कि स्ट्रोक में हर मिनट किसी मरीज के लिये किमती होता है, और जितना अधिक इलाज में देर होगा, उतना ही दिमाग को नुकसान पहुंचेगा। स्ट्रोक होने के बाद पहले तीन घंटे में केवल दवा देकर दिमाग को नष्ट होने से बचाया जा सकता है।
- अचानक किसी व्यक्ति का चेहरा, हाथ-पैर, शरीर एक तरफ से सुन होना या कमजोर पड़ जाना
- अचानक किसी व्यक्ति को समझने में या बोलने में दिक्कत हो रहा है
- अचानक किसी व्यक्ति को एक या दोनों आंख से देखने में दिक्कत हो रहा है
- अचानक किसी व्यक्ति को चलने में दिक्कत होना, चक्कर आना, संतुलन में दिक्कत होना
- अचानक किसी व्यक्ति को अकारण ही बहुत तेज सिरदर्द होना
स्ट्रोक कैसे होता है?
स्ट्रोक दो प्रकार से होता है। पहला हुआ “इसचेमिक” और दूसरा हुआ “हेमोरहेजिक” स्ट्रोक।
“इसचेमिक स्ट्रोक” में दिमाग के किसी भाग में खून का नस जाम (blockage) हो जाता है। यह खून का थक्का के जमने से होता है।
“हेमोरहेजिक स्ट्रोक” में दिमाग के किसी भाग में खून के नस के फटने से, दिमाग में खून बहने से होता है।
“इसचेमिक स्ट्रोक” में दिमाग के किसी भाग में खून का नस जाम (blockage) हो जाता है। यह खून का थक्का के जमने से होता है।
“हेमोरहेजिक स्ट्रोक” में दिमाग के किसी भाग में खून के नस के फटने से, दिमाग में खून बहने से होता है।
Neurology : स्ट्रोक किसको कहते हैं?
दिमाग को सुचारू रूप से चलाने के लिये हमेशा आक्सिजन और चीनी चाहिये होता है, जिससे कि दिमाग को निरंतर उर्जा का सपलाई रहता है। ये दोनों चीज, दिमाग को, खून द्वारा प्राप्त होता है। अगर दिमाग के किसी भाग में, खून का नस जाम हो जाता है, तो उस भाग को खून नहीं प्राप्त होता है। इससे उर्जा का कमी होता है, और तुरंत अगर खून न मिला, तो उस भाग को नुकसान पहुंच सकता है। इसे स्ट्रोक या सदमा कहते हैं।
आंख कलर बलाईंड किसे कहते हैं?
रंग या रंगों के प्रति अंधापन को कलर बलाईंड कहते हैं। इससे किसी एक या अधिक प्रकार के रंग को सही तरह से देखने में दिक्कत होता है। अधिकतर लोगों में, यह स्थिती जन्म से होता है, और यह उनके सामान्य जीवन पर भी असर करता है। यह पुरुषों में, महिलाओं के अनुपात में, अधिक होता है। कुछ लोग को बाद में चोट लगने से, सर्जरी से और अन्य बीमारी के कारण भी कलर बलाईंड हो सकता है।
2. सामान्य स्थिती में रंग कैसे दिखाई पडता है?
रंग को सही तरह से देखने के लिये, आंखों में विशेष प्रकार के सेल (cell) या कोशिका होते हैं जिन्हें कोंस (cones) कहा जाता है। ये कोंस तीन तरह के होते हैं, जो कि लाल, हरा और नीला देखने के लिये सक्षम होते हैं। इन तीनों प्रकार के सही रूप से काम करने पर सभी रंग अपने असली रूप में दिखते हैं। अगर इन कोंस में से किसी एक प्रकार का कोंस में समस्या है, तो कोई एक या अधिक प्रकार का रंग सही तरह से नहीं दिख सकता है।
रोशनी, उर्जा का रूप होता है। यह एक जगह से दूसरे जगह तक तरंग के रूप में प्रवाहित होता है; जैसे कि पानी में लहरें। सफेद रोशनी में तीनों रंग, लाल, हरा और नीले रंग का मिश्रण होता है। हरेक रंग अपने अलग तरंग पर चलता है। हर रंग का तरंग का लंम्बाई अलग होता है। लाल रंग का तरंग लंम्बा होता है, जिसे लोंग वेवलेंथ (long wavelength) कहते हैं, और इस प्रकार के तरंग को देखने के लिये एल-कोंस (L cones) चाहिये होता है। हरा रंग का तरंग मध्यम होता है, जिसे मिडीयम वेवलेंथ (medium wavelength) कहते हैं, और इस प्रकार के तरंग को देखने के लिये एम-कोंस (M cones) चाहिये होता है। नीला रंग का तरंग छोटा होता है, जिसे शोर्ट वेवलेंथ (short wavelength) कहते हैं, और इस प्रकार के तरंग को देखने के लिये एस-कोंस (S cones) चाहिये होता है। इन तीनों प्रकार के कोंस से प्राप्त सिग्नल के अनुपात से दिमाग को समझ आता है कि किसी वस्तु का क्या रंग है?
3. कलर बलाईंड कितने प्रकार के होते हैं?
Normal Vision
रंग को पहचानने के लिये तीन तरह के कोंस चाहिये होते हैं। इसीलिये, तीन प्रमुख प्रकार के कलर बलाईंड होने के स्थिती होते हैं। अर्थात लाल, हरा या नीले देखने में दिक्कत होता है। इसके अलावा, कुछ लोगों में अतिरिक्त तरह के कलर बलाईंड होने के स्थिती होते हैं।
Red - Green Color Blindness
अगर किसी को आंखों में एल-कोंस (L cones) नहीं है, तो उसे लाल और हरा रंग नहीं दिखाई देगा, और उसे प्रोटानोपिया (protanopia) कहते हैं। यह हल्का या पूर्ण रूप से हो सकता है। इसमें लाल और हरा रंग एक जैसा ही दिखता है।
Red - Green Color Blindness
अगर किसी को आंखों में एम-कोंस (M cones) नहीं है, तो उसे लाल और हरा रंग नहीं दिखाई देगा, और उसे डियुटानोपिया (deutanopia) कहते हैं। यह हल्का या पूर्ण रूप से हो सकता है। इसमें लाल और हरा रंग एक जैसा ही दिखता है।
Blue Color Blindness
अगर किसी को आंखों में एस-कोंस (S cones) नहीं है, तो उसे नीला और पीला रंग नहीं दिखाई देगा, और उसे ट्राईटानोपिया (tritanopia) कहते हैं। यह हल्का या पूर्ण रूप से हो सकता है। यह बहुत कम लोगों में होता है।
अधिकतर लोग मिश्रित रूप में कलर बलाईंड होते हैं।
2. सामान्य स्थिती में रंग कैसे दिखाई पडता है?
रंग को सही तरह से देखने के लिये, आंखों में विशेष प्रकार के सेल (cell) या कोशिका होते हैं जिन्हें कोंस (cones) कहा जाता है। ये कोंस तीन तरह के होते हैं, जो कि लाल, हरा और नीला देखने के लिये सक्षम होते हैं। इन तीनों प्रकार के सही रूप से काम करने पर सभी रंग अपने असली रूप में दिखते हैं। अगर इन कोंस में से किसी एक प्रकार का कोंस में समस्या है, तो कोई एक या अधिक प्रकार का रंग सही तरह से नहीं दिख सकता है।
रोशनी, उर्जा का रूप होता है। यह एक जगह से दूसरे जगह तक तरंग के रूप में प्रवाहित होता है; जैसे कि पानी में लहरें। सफेद रोशनी में तीनों रंग, लाल, हरा और नीले रंग का मिश्रण होता है। हरेक रंग अपने अलग तरंग पर चलता है। हर रंग का तरंग का लंम्बाई अलग होता है। लाल रंग का तरंग लंम्बा होता है, जिसे लोंग वेवलेंथ (long wavelength) कहते हैं, और इस प्रकार के तरंग को देखने के लिये एल-कोंस (L cones) चाहिये होता है। हरा रंग का तरंग मध्यम होता है, जिसे मिडीयम वेवलेंथ (medium wavelength) कहते हैं, और इस प्रकार के तरंग को देखने के लिये एम-कोंस (M cones) चाहिये होता है। नीला रंग का तरंग छोटा होता है, जिसे शोर्ट वेवलेंथ (short wavelength) कहते हैं, और इस प्रकार के तरंग को देखने के लिये एस-कोंस (S cones) चाहिये होता है। इन तीनों प्रकार के कोंस से प्राप्त सिग्नल के अनुपात से दिमाग को समझ आता है कि किसी वस्तु का क्या रंग है?
3. कलर बलाईंड कितने प्रकार के होते हैं?
Normal Vision
रंग को पहचानने के लिये तीन तरह के कोंस चाहिये होते हैं। इसीलिये, तीन प्रमुख प्रकार के कलर बलाईंड होने के स्थिती होते हैं। अर्थात लाल, हरा या नीले देखने में दिक्कत होता है। इसके अलावा, कुछ लोगों में अतिरिक्त तरह के कलर बलाईंड होने के स्थिती होते हैं।
Red - Green Color Blindness
अगर किसी को आंखों में एल-कोंस (L cones) नहीं है, तो उसे लाल और हरा रंग नहीं दिखाई देगा, और उसे प्रोटानोपिया (protanopia) कहते हैं। यह हल्का या पूर्ण रूप से हो सकता है। इसमें लाल और हरा रंग एक जैसा ही दिखता है।
Red - Green Color Blindness
अगर किसी को आंखों में एम-कोंस (M cones) नहीं है, तो उसे लाल और हरा रंग नहीं दिखाई देगा, और उसे डियुटानोपिया (deutanopia) कहते हैं। यह हल्का या पूर्ण रूप से हो सकता है। इसमें लाल और हरा रंग एक जैसा ही दिखता है।
Blue Color Blindness
अगर किसी को आंखों में एस-कोंस (S cones) नहीं है, तो उसे नीला और पीला रंग नहीं दिखाई देगा, और उसे ट्राईटानोपिया (tritanopia) कहते हैं। यह हल्का या पूर्ण रूप से हो सकता है। यह बहुत कम लोगों में होता है।
अधिकतर लोग मिश्रित रूप में कलर बलाईंड होते हैं।
सांस लेने के अलावा फेफड़ा का और क्या काम होता है?
फेफड़ा खून में बहते हुये थक्का को छान के (फिल्टर) खून को साफ करता है।
खून के तेजाबी संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण है।
दिल को घेर के, एक तरह से दिल को चोट लगने से बचाता है।
फेफड़ा में एक तरह का एनजाईम होता है, जिसे एंजीयोटेंसिन कंवर्टिंग एनजाईम कहते हैं। यह आपके शरीर के रक्तचाप के संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण है।
खून के तेजाबी संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण है।
दिल को घेर के, एक तरह से दिल को चोट लगने से बचाता है।
फेफड़ा में एक तरह का एनजाईम होता है, जिसे एंजीयोटेंसिन कंवर्टिंग एनजाईम कहते हैं। यह आपके शरीर के रक्तचाप के संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण है।
फेफड़ा शरीर में कैसे सांस लेने में मद्द करता है?
शरीर में दो फेफड़ा होता है। ये दोनो, हृदय के दोनो तरफ होते हैं और उसके साथ मिलकर काम करतेहैं। इसीलिये इन दोनो को एक साथ “कारडीयो-पलमोनेरी सिस्टम” या Cardio-pulmonary System कहा जाता है।
उदाहरण के लिये जैसे आपके रसोईघर में बिजली का पानी फिल्टर। आपके बटन दबाते ही, मशीन का मोटर चलता है और आपको फिल्टर्ड वाटर या साफ पानी मिलने लगता है। ठीक उसी तरह, आपका दिल, शरीर के खून को कुछ सेकंड के लिये फेफड़ा में ले जाता है। उतने ही देर में फेफड़ा, आपके शरीर के प्रदूषित खून को साफ खून में बदल देता है। यहां आपका दिल उसी मोटर के तरह है जो खून को पम्प करता है, और आपका फेफड़ा उसी फिल्टर के तरह है जो कि गंदे पानी को साफ पानी में बदल देता है।
शरीर में सेल (क़ोशिका या Cell) को जीवित रहने के लिये, निरंतर सांस लेना पड़ता है। इस क्रिया से उर्जा (energy) उत्तपन होता है, जिससे सेल का अस्तितव बना रहता है। इसमें सेल आक्सिजन गेस (oxygen) को अंदर लेता है, और सेल के पाचन क्रिया से उत्तपन कार्बन-डाइओक्साईड (carbon dioxide) को छोड़ देता है। यही जब आप करते हैं, तो उसको सांस लेना कहते हैं।
सेल से उत्तपन कार्बन-डाइओक्साईड और आक्सिजन कि कमी, खून को प्रदूषित करता है, क्योंकि यह सेल को सांस लेने में मद्द नहीं कर सकता है। आपका देह, फिर इस प्रदूषित खून को दिल के द्वारा, फेफड़ा क पास भेज देता है। वहां खून में से कार्बन-डाइओक्साईड निकाल कर, हवा में सांस छोड़ने पर शरीर से बाहर निकाला जाता है। साथ ही, सांस लेने पर, हवा का आक्सिजन गेस को खून में सोख लिया जाता है। सांस लेने को इंहेल (inhale) और सांस छोड़ने को एक्सहेल (exhale) कहा जाता है।
जब खून में कार्बन-डाइओक्साईड (carbon dioxide) का परिवर्तन होता है, तो खून के रसायन या केमिस्टरी (chemistry) पर भी असर पड़ता है। अधिक कार्बन-डाइओक्साईड से खून में तेजाब का मात्रा अधिक हो जाता है, और उलटे कार्बन-डाइओक्साईड के अत्याधिक कमी से खून में तेजाब का मात्रा अत्याधिक कम हो जाता है। इससे खून में अन्य रसायनों और विभिन नमक के मात्रा में बदलाव आ सकता है।
इस सभी क्रम में कहीं दिल या फेफड़ा के बीमारी के कारण अगर कोई रोकावट आता है, तो इससे खून प्रदूषित रहता है, और इससे शरीर के सभी सेल पर असर पड़ता है। सेल को सांस लेने में (cellular respiration), उर्जा उतपादन में (cellular energy production), खून के रसायन संतुलन में (blood chemistry balance), खून के तेजाबी संतुलन में (blood pH balance or hydrogen ion concentration) और सेल के जीवित रहने में (cell survival) दिक्कत हो सकता है।
फेफड़ा का क्या काम होता है?
फेफड़ा का शरीर में अनेक काम होता है। उसे मुख्य दो प्रकार से बांट सकते हैं। पहला कि शरीर को सांस लेने में मदद करना और दूसरा कि शरीर में अन्य काम करना।
अलवियोलस (alveolus) के बारे में बतायें?
सामन्य व्यस्क में, दोनों फेफड़ों को मिलाकर, औसतन करीब 50 करोड़ अलवियोलस होता है।
सभी लोगों में अलवियोलस (alveolus) का माप (size) समान होता है।
एक अलवियोलस (alveolus) का माप (size) करीब 4.2 x 106 µm3 होता है।
1 मिलीमिटर घनफल फेफड़ा में करीब 170 अलवियोलस होते हैं।
बडे लोगों में अलवियोलस का नंबर अधिक होता है।
फेफड़ों के बीमारी से या क्षति पहुंचने से, जैसे कि धुम्रपान से, अलवियोलस का नंबर बहुत कम हो जाता है। इससे फेफड़ों से सांस लेने में दिक्कत होता है।
सामन्य व्यस्क में, दोनों फेफड़ों को मिलाकर, औसतन करीब 50 करोड़ अलवियोलस होता है।
सभी लोगों में अलवियोलस (alveolus) का माप (size) समान होता है।
एक अलवियोलस (alveolus) का माप (size) करीब 4.2 x 106 µm3 होता है।
1 मिलीमिटर घनफल फेफड़ा में करीब 170 अलवियोलस होते हैं।
बडे लोगों में अलवियोलस का नंबर अधिक होता है।
फेफड़ों के बीमारी से या क्षति पहुंचने से, जैसे कि धुम्रपान से, अलवियोलस का नंबर बहुत कम हो जाता है। इससे फेफड़ों से सांस लेने में दिक्कत होता है।
फेफड़ों और पेड़ में क्या संबंध है?
सांस लेने पर, हवा नाक से होते हुये, सांस कि नलियां द्वारा फेफड़ों तक पहुंचता है। सांस कि नलियों को समझने के लिये आप सोच सकते हैं किसी पेड़ के तरह। जैसे किसी पेड़ में एक मुख्य तना होता है, फिर विभाजित होकर शाखा निकलते हैं, और फिर अंगिनत विभाजन से अंगिनत छोटे-छोटे शाखा निकलते हैं, और उनसे टहनियां निकलते हैं, जिस पर अंत में पत्ते रहते हैं। पत्ते पेड़ को सांस लेने में मदद करते हैं। हर एक पत्ता, इस संगठन में सबसे छोटा युनिट या इकाई है। इस तरह के व्यवस्थापन से सांस लेने के लिय अंगिनत पत्ते, एक पेड़ को के मुख्य तना से लगे होते हैं। इन सभी सांस के नालियों के साथ अनगिनत खून के नालियां या रक्त वाहिकायें या blood vessel साथ में रहती हैं
फेफड़ों में खून की नालियां, © Obscura
ठीक उसी तरह, सांस लेने के सबसे छोटे युनिट को अलवियोलस (alveolus) कहते हैं। बहुत सारे अलवियोलस जुड़ कर बनते हैं अलवियोलाइ (alveoli)। ये जिस सांस के नली पर रहते हैं, उसे अलवियोलर डक्ट (alveolar duct)। कहते हैं। ये सारे हवा के आदान-प्रदान में काम आते हैं, जिससे कि शुद्ध हवा खून को मिलता है, और अशुद्ध हवा खून से बाहर निकलता है।
जैसे कि पत्तों के समूह को अंगिनत टहनियां और शाखा मुख्य तना से जोड़ते हैं, उसी तरह इन अलवियोलाइ को अंगिनत सांस लेने के नलीयां, मुख्य तने से जोड़ते हैं। इन सांस लेने के नलीयां को इस तरह से नाम दिया गया है, बड़ा से छोटा के क्रम में, ट्रेकिया, प्राइमरी ब्रोंकाइ, सेकंडरी ब्रोंकाइ, टरशीयरी ब्रोंकाइ, ब्रोंक्यिओल्स, अलवियोलर डक्ट, अलवियोलाइ और अलवियोलस। ट्रेकिया या व्हिंडपाईप (Trachea, windpipe) मुख्य सांस लेने के नली को कहा जाता है। फेफड़ों में करीब 23 बार सांस लेने के नलीयां का विभाजन होता है। इसका मतलब है कि एक से दो, दो से चार, चार से आठ, आठ से सोलह, और इस तरह 23 से 24 बार।
फेफड़ों में खून की नालियां, © Obscura
ठीक उसी तरह, सांस लेने के सबसे छोटे युनिट को अलवियोलस (alveolus) कहते हैं। बहुत सारे अलवियोलस जुड़ कर बनते हैं अलवियोलाइ (alveoli)। ये जिस सांस के नली पर रहते हैं, उसे अलवियोलर डक्ट (alveolar duct)। कहते हैं। ये सारे हवा के आदान-प्रदान में काम आते हैं, जिससे कि शुद्ध हवा खून को मिलता है, और अशुद्ध हवा खून से बाहर निकलता है।
जैसे कि पत्तों के समूह को अंगिनत टहनियां और शाखा मुख्य तना से जोड़ते हैं, उसी तरह इन अलवियोलाइ को अंगिनत सांस लेने के नलीयां, मुख्य तने से जोड़ते हैं। इन सांस लेने के नलीयां को इस तरह से नाम दिया गया है, बड़ा से छोटा के क्रम में, ट्रेकिया, प्राइमरी ब्रोंकाइ, सेकंडरी ब्रोंकाइ, टरशीयरी ब्रोंकाइ, ब्रोंक्यिओल्स, अलवियोलर डक्ट, अलवियोलाइ और अलवियोलस। ट्रेकिया या व्हिंडपाईप (Trachea, windpipe) मुख्य सांस लेने के नली को कहा जाता है। फेफड़ों में करीब 23 बार सांस लेने के नलीयां का विभाजन होता है। इसका मतलब है कि एक से दो, दो से चार, चार से आठ, आठ से सोलह, और इस तरह 23 से 24 बार।
फेफड़ा का बनावट के बारे में बतायें?
Lungs, Source: Wikipedia
Trachea = ट्रेकिया
Pulmonary artery = प्लमोनेरी आरटेरी
Pulmonary vein = प्लमोनेरी वेंन
Alveolar duct = अलवीयोलर डक्ट
Alveoli = अलवीयोलाइ
Cardiac notch = कार्डियाक नोच
Bronchioles = ब्रोंक्यिओल्स
Tertiary bronchi = टरशीयरी ब्रोंकाइ
Secondary bronchi = सेकंडरी ब्रोंकाइ
Primary bronchi = प्राइमरी ब्रोंकाइ
Larynx = लेरिंक्स
शरीर में दो फेफड़े हैं। ये छाती में, दिल के दोनो ओर स्थित रहते हैं। हर फेफड़ा में खून के नस और सांस लेने के नलीयां का जटिल जाल फैला रहता है। इन करोडों सांस कि नलीयां से हवा का अदला-बदली का क्षेत्रफल बढ जाता है।
Trachea = ट्रेकिया
Pulmonary artery = प्लमोनेरी आरटेरी
Pulmonary vein = प्लमोनेरी वेंन
Alveolar duct = अलवीयोलर डक्ट
Alveoli = अलवीयोलाइ
Cardiac notch = कार्डियाक नोच
Bronchioles = ब्रोंक्यिओल्स
Tertiary bronchi = टरशीयरी ब्रोंकाइ
Secondary bronchi = सेकंडरी ब्रोंकाइ
Primary bronchi = प्राइमरी ब्रोंकाइ
Larynx = लेरिंक्स
शरीर में दो फेफड़े हैं। ये छाती में, दिल के दोनो ओर स्थित रहते हैं। हर फेफड़ा में खून के नस और सांस लेने के नलीयां का जटिल जाल फैला रहता है। इन करोडों सांस कि नलीयां से हवा का अदला-बदली का क्षेत्रफल बढ जाता है।
Topics in Blood
डी वी टी किसे कहते हैं?
जब खून के नसों में खून का थक्का जमता है, उसे थ्रोम्बोसिस कहते हैं अगर यह शरीर के भीतरी नसों में हो तो, उसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस कहते हैं यह अकसर पैर के नसों में होता है
2. डी वी टी का क्या महत्व है?
अगर यह जमा हुआ खून का थक्का, पैर से निकल कर फेफड़ों तक पहुंच जाता तो यह भयानक बीमारी कर सकता है या फिर जानलेवा भी हो सकता है
3. डी वी टी क्यों होता है?
डी वी टी खून के जमने से होता है इसके विभिन्न कारण हैं, लेकिन मुख्य रूप से दो प्रकार के कारण हो सकते हैं
पहला, की खून का बहाव धीरे है या रुक गया है उदाहरण के लिए नीचे अनेक स्थिती दिए गए हैं, जिसमें कि पैर का उपयोग कम होता है -
किसी बीमारी या गर्भ में बिस्तर पर लेटे रहना पड़ रहा है
आप अधिकतर खड़े होकर काम करते हैं, जैसे कि अध्यापक, नर्स, सर्जन या अन्य
आप लंबे समय तक पैर नहीं चलाते हैं, जैसे कि बहुत देर का विमान यात्रा
दूसरा कि खून में जमने का प्रवृती बढ़ गया है खून में अनेक प्रकार के चीज होते हैं, कुछ का काम होता है किसी कटने पर खून को जमाना और कुछ का काम होता है कि खून के नसों के अंदर खून को बहने देना सामान्य स्थिती में, ये दोनों तरह के पदार्थ संतुलित मात्रा में रहते हैं अगर किसी कारण से यह संतुलन बिगड़ता है, तो नसों के अंदर खून जम सकता है उदाहरण के लिए नीचे अनेक स्थिती दिए गए हैं -
किसी भी प्रकार का सामन्य सर्जरी या शल्य क्रिया, जो कि पैर, जांघ, कमर या पेल्विस पर किया गया हो
किसी भी प्रकार का आर्थोपेडिक सर्जरी या हड्डी टूटने पर शल्य क्रिया, जो कि पैर, जांघ, कमर या पेल्विस पर किया गया हो
कैंसर होने से डी वी टी का खतरा बढ़ जाता है
धूम्रपान करने से डी वी टी का खतरा बढ़ जाता है
दिल का बीमारी जिसमें दिल कमजोर हो जाता है इसे कांजेसटिव हार्ट फैलिअर (congestive heart failure) कहते हैं इस स्थिती में दिल पूरे तरह से खून को पम्प करने में सक्षम नहीं होता है, और खून पैरों में जमा होने लगता है
पैर के नसों के कमजोरी से जिसमें भी खून पैरों में जमा होने लगता है सामान्य स्थिती में खून को पैर से दिल के तरफ लौटना चाहिए इसमें पैर में एक तरफ जाने के लिए वाल्व होता है, जो खून का बहाव को दिल के तरफ रखता है अगर नसों के वाल्व में कमजोरी आ जाता है, तो खून के बहाव में रुकावट आ जाता है, और फिर पैर में खून जमा होने लगता है
अगर आप गर्भ निरोधक गोली (oral contraceptive pills) लेते हैं
अगर आपको मोटापा है
अगर आपको मेनोपौज़ (menopause) हो चुका है
जब खून के नसों में खून का थक्का जमता है, उसे थ्रोम्बोसिस कहते हैं अगर यह शरीर के भीतरी नसों में हो तो, उसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस कहते हैं यह अकसर पैर के नसों में होता है
2. डी वी टी का क्या महत्व है?
अगर यह जमा हुआ खून का थक्का, पैर से निकल कर फेफड़ों तक पहुंच जाता तो यह भयानक बीमारी कर सकता है या फिर जानलेवा भी हो सकता है
3. डी वी टी क्यों होता है?
डी वी टी खून के जमने से होता है इसके विभिन्न कारण हैं, लेकिन मुख्य रूप से दो प्रकार के कारण हो सकते हैं
पहला, की खून का बहाव धीरे है या रुक गया है उदाहरण के लिए नीचे अनेक स्थिती दिए गए हैं, जिसमें कि पैर का उपयोग कम होता है -
किसी बीमारी या गर्भ में बिस्तर पर लेटे रहना पड़ रहा है
आप अधिकतर खड़े होकर काम करते हैं, जैसे कि अध्यापक, नर्स, सर्जन या अन्य
आप लंबे समय तक पैर नहीं चलाते हैं, जैसे कि बहुत देर का विमान यात्रा
दूसरा कि खून में जमने का प्रवृती बढ़ गया है खून में अनेक प्रकार के चीज होते हैं, कुछ का काम होता है किसी कटने पर खून को जमाना और कुछ का काम होता है कि खून के नसों के अंदर खून को बहने देना सामान्य स्थिती में, ये दोनों तरह के पदार्थ संतुलित मात्रा में रहते हैं अगर किसी कारण से यह संतुलन बिगड़ता है, तो नसों के अंदर खून जम सकता है उदाहरण के लिए नीचे अनेक स्थिती दिए गए हैं -
किसी भी प्रकार का सामन्य सर्जरी या शल्य क्रिया, जो कि पैर, जांघ, कमर या पेल्विस पर किया गया हो
किसी भी प्रकार का आर्थोपेडिक सर्जरी या हड्डी टूटने पर शल्य क्रिया, जो कि पैर, जांघ, कमर या पेल्विस पर किया गया हो
कैंसर होने से डी वी टी का खतरा बढ़ जाता है
धूम्रपान करने से डी वी टी का खतरा बढ़ जाता है
दिल का बीमारी जिसमें दिल कमजोर हो जाता है इसे कांजेसटिव हार्ट फैलिअर (congestive heart failure) कहते हैं इस स्थिती में दिल पूरे तरह से खून को पम्प करने में सक्षम नहीं होता है, और खून पैरों में जमा होने लगता है
पैर के नसों के कमजोरी से जिसमें भी खून पैरों में जमा होने लगता है सामान्य स्थिती में खून को पैर से दिल के तरफ लौटना चाहिए इसमें पैर में एक तरफ जाने के लिए वाल्व होता है, जो खून का बहाव को दिल के तरफ रखता है अगर नसों के वाल्व में कमजोरी आ जाता है, तो खून के बहाव में रुकावट आ जाता है, और फिर पैर में खून जमा होने लगता है
अगर आप गर्भ निरोधक गोली (oral contraceptive pills) लेते हैं
अगर आपको मोटापा है
अगर आपको मेनोपौज़ (menopause) हो चुका है
आरटेरी (artery) किसको कहते हैं?
आरटेरी, उस रक्त वाहिका को कहते हैं जो शरीर में खून पहुंचाता है। उसका उल्टा है वेन (vein), जो कि शरीर से खून को वापस दिल में लाता है।
कोरोनरी आरटेरी (coronary artery) किसको कहते हैं?
शरीर में खून पहुंचाने ले लिये दिल एक पंप के जैसे काम करते रहता है। इस पंप को सदैव चालू रखने के लिये दिल में खून का सप्पलाई एक अलग रक्त वाहिका के द्वारा करते हैं, जिसे कोरोनरी आरटेरी कहते हैं। दिल में दो कोरोनेरी आरटेरी होते हैं – जो कि दायं और बायं ओर जाते हैं। दायां आरटेरी फिर पीछे के तरफ खून पहुंचाता है। बायां कोरोनेरी एक तना, दिल के आगे के तरफ खून पहुंचाता है।
एथेरोस्कलेरोसिस (atherosclerosis) किसको कहते हैं?
शरीर में अधिक चिकनाई या फैट होने पर विभिन्न जगहों पर जमा होने लगते हैं। एक ऐसा जगह है, रक्त वाहिका। उसके दीवार के अंदर चिकनाई जमा हो सकता है। उस पर से समय के साथ कैलशियम और अन्य चीज भी उस चिकनाई में जमा होते रहते हैं, और जमाव को पलाक (plaque) कहते हैं। इससे उस रक्त वाहिका का आंतरिक व्यास कम हो जाता है। इस सारे क्रम को एथेरोस्कलेरोसिस कहते हैं।
कोरोनेरी आरटेरी डिसइज़ (coronary artery disease) किसको कहते हैं?
जब कोरोनेरी आरटेरी के अंदर एथेरोस्कलेरोसिस हो जाता है, तो उसे कोरोनेरी आरटेरी डिसइज़ कहते हैं। इससे दिल के विभिन्न भागों को कम खून मिलता है, और दिल सही तरह से काम नहीं कर पाता है। कभी-कभार अचानक इस पलाक पर घाव बन जाने पर, खून जम जाता है, और फिर अचानक दिल के किसी कोने में खून का सप्पलाई बंद हो जाता है। इसे दिल का दौरा या हार्ट अटैक (Heart attack) कहते हैं। बगैर ततकाल इलाज के, यह जानलेवा हो सकता है।
कोरोनेरी आरटेरी क्यों संकुचित होता है?
अपने घर के बगीचे में पाने पटाने के लिये आप अलग अलग पाईप रखे हैं। मान लिजीये कि किसी कारण से अगर कोई पाईप खराब हो गया तो बगीचे का कोई कोना को पानी मिलना बंद हो जायेगा। और अगर किसी और तरीके से पानी नहीं मिला तो घास मर जायेगा। ठीक उसी तरह से कोरोनेरी आरटेरी डिसइज़ होता है।
कोरोनेरी आरटेरी और उसके शाखा, दिल को खून पहुंचाते हैं। ये पाईप के जैसा होता है। शरीर में अधिक चिकनाई होने पर, अधिक फैट, कोरोनेरी आरटेरी और उसके विभिन्न शाखा पर जमने लगता है। यह सभी लोगों में बचपन से ही शुरू हो जाता है। अधिक चिकनाई युक्त खाना खाने से यह क्रम तेज हो जाता है। खून में बहते अनेक चीज और सेल, जैसे कि कैलशियम और प्रोटीन, इस चिकनाई में समाने लगते हैं और इसका आहिस्ता-आहिस्ता साईज बढते रहता है। इसको फिर पलाक कहते हैं, और उस रक्त वाहिका के क्रम को एथेरोस्कलेरोसिस (atherosclerosis) कहते हैं। इसको रक्त वाहिका का कड़ा होना या हारडेनिंग (Hardening of arteries) भी कहा जाता है।
समय के साथ पलाक का उपरी सतह, कवच के जैसा कड़ा हो जाता है। लेकिन अंदर से फिर भी नर्म रहता है। कभी-कभार उपरी कवच में दरार पर जाता है। इससे अंदूरनी चिकनाई उभर पड़ता है। इसपर खून जमने लगता है, और खून का थक्का बन जाता है। खून में उपस्थित अनेक प्रोटीन और पलेटलेट्स सेल के द्वारा यह होता है। यह थक्का अगर रक्त वहिका को पूरा जाम कर दिया तो तुरंत आगे के लिये खून का सप्प्लाई बंद हो जाता है, जिससे दिल का दौरा पड़ता है। ततकाल इलाज में एक दवा यह भी दिया जाता है जो कि खून को थक्का बनने से रोके या तुंरत बने हुये थक्का को गलाये और रक्त प्रवाह को फिर से स्थापित करे।
अगर बहुत समय से यह रुकावट बन रहा है, तो शरीर नये रक्त वहिका बनाता है, जो कि अतीरिक्त खून सप्पलाई करने के लिये होता है। उदाहरण के लिये अगर आपके बगीचे में कोई पाईप ठीक से काम नहीं कर रहा है, तो आप अतीरिक्त पाईप लगा दें। उसे “कोलेटरल सरकुलेशन” (collateral circulation) कहते हैं। यह सामान्य स्थिती में काम दे सकता है। लेकिन क्योंकि ये नये रक्त वाहिका पतले होते हैं, तो कभी बहुत मेहनत करने पर पूर्णरूप से खून नहीं पहुंचा पाते हैं।
कोरोनेरी आरटेरी के जाम होने से क्या हो सकता है? कोरोनेरी आरटेरी या उसके शाखा के पूर्ण जाम होने से अलग-अलग तरह के लक्षण हो सकते हैं। सभी को मिलाकर “कोरोनेरी सिंड्रोम” कहते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं -
अस्थायी दर्द होना या “अनस्टेबल एंजाइना” (unstable angina) – यह दिल में दर्द उठने का नया लक्षण होता है, जो कि पूरा दिल के दौरा में भी परिवर्तित हो सकता है। इसके लिये इलाज निहायत जरूरी है।
दिल के दौआ बगैर ई सी जी में बदलाव के – एंस्टेमी या NSTEMI (Non-ST segment elevation myocardial infarction) – यह हल्का हार्ट अटैक होता है, जिसमें कि ई सी जी के जांच में कोई फर्क नहीं दिखता है। लेकिन अन्य खून टेस्ट से पता चलता है कि दिल को जरा से नुकसान हुआ है। इस स्थिती में कोरोनेरी आरटेरी और उसके शाखा का थोड़ा रुकावट होता है। इसमें भी इलाज चाहिये।
दिल के दौआ के साथ ई सी जी में बदलाव – स्टेमी या STEMI (ST segment elevation myocardial infarction) – यह भारी हार्ट अटैक होता है, जिसमें कि ई सी जी के जांच में फर्क दिखता है, और अन्य खून टेस्ट से भी पता चलता है कि दिल को भारी नुकसान हुआ है। इस स्थिती में कोरोनेरी आरटेरी और उसके शाखा का पूर्ण रुकावट होता है। इसमें भी ततकाल इलाज चाहिये।
कोरोनेरी आरटेरी और उसके शाखा, दिल को खून पहुंचाते हैं। ये पाईप के जैसा होता है। शरीर में अधिक चिकनाई होने पर, अधिक फैट, कोरोनेरी आरटेरी और उसके विभिन्न शाखा पर जमने लगता है। यह सभी लोगों में बचपन से ही शुरू हो जाता है। अधिक चिकनाई युक्त खाना खाने से यह क्रम तेज हो जाता है। खून में बहते अनेक चीज और सेल, जैसे कि कैलशियम और प्रोटीन, इस चिकनाई में समाने लगते हैं और इसका आहिस्ता-आहिस्ता साईज बढते रहता है। इसको फिर पलाक कहते हैं, और उस रक्त वाहिका के क्रम को एथेरोस्कलेरोसिस (atherosclerosis) कहते हैं। इसको रक्त वाहिका का कड़ा होना या हारडेनिंग (Hardening of arteries) भी कहा जाता है।
समय के साथ पलाक का उपरी सतह, कवच के जैसा कड़ा हो जाता है। लेकिन अंदर से फिर भी नर्म रहता है। कभी-कभार उपरी कवच में दरार पर जाता है। इससे अंदूरनी चिकनाई उभर पड़ता है। इसपर खून जमने लगता है, और खून का थक्का बन जाता है। खून में उपस्थित अनेक प्रोटीन और पलेटलेट्स सेल के द्वारा यह होता है। यह थक्का अगर रक्त वहिका को पूरा जाम कर दिया तो तुरंत आगे के लिये खून का सप्प्लाई बंद हो जाता है, जिससे दिल का दौरा पड़ता है। ततकाल इलाज में एक दवा यह भी दिया जाता है जो कि खून को थक्का बनने से रोके या तुंरत बने हुये थक्का को गलाये और रक्त प्रवाह को फिर से स्थापित करे।
अगर बहुत समय से यह रुकावट बन रहा है, तो शरीर नये रक्त वहिका बनाता है, जो कि अतीरिक्त खून सप्पलाई करने के लिये होता है। उदाहरण के लिये अगर आपके बगीचे में कोई पाईप ठीक से काम नहीं कर रहा है, तो आप अतीरिक्त पाईप लगा दें। उसे “कोलेटरल सरकुलेशन” (collateral circulation) कहते हैं। यह सामान्य स्थिती में काम दे सकता है। लेकिन क्योंकि ये नये रक्त वाहिका पतले होते हैं, तो कभी बहुत मेहनत करने पर पूर्णरूप से खून नहीं पहुंचा पाते हैं।
कोरोनेरी आरटेरी के जाम होने से क्या हो सकता है? कोरोनेरी आरटेरी या उसके शाखा के पूर्ण जाम होने से अलग-अलग तरह के लक्षण हो सकते हैं। सभी को मिलाकर “कोरोनेरी सिंड्रोम” कहते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं -
अस्थायी दर्द होना या “अनस्टेबल एंजाइना” (unstable angina) – यह दिल में दर्द उठने का नया लक्षण होता है, जो कि पूरा दिल के दौरा में भी परिवर्तित हो सकता है। इसके लिये इलाज निहायत जरूरी है।
दिल के दौआ बगैर ई सी जी में बदलाव के – एंस्टेमी या NSTEMI (Non-ST segment elevation myocardial infarction) – यह हल्का हार्ट अटैक होता है, जिसमें कि ई सी जी के जांच में कोई फर्क नहीं दिखता है। लेकिन अन्य खून टेस्ट से पता चलता है कि दिल को जरा से नुकसान हुआ है। इस स्थिती में कोरोनेरी आरटेरी और उसके शाखा का थोड़ा रुकावट होता है। इसमें भी इलाज चाहिये।
दिल के दौआ के साथ ई सी जी में बदलाव – स्टेमी या STEMI (ST segment elevation myocardial infarction) – यह भारी हार्ट अटैक होता है, जिसमें कि ई सी जी के जांच में फर्क दिखता है, और अन्य खून टेस्ट से भी पता चलता है कि दिल को भारी नुकसान हुआ है। इस स्थिती में कोरोनेरी आरटेरी और उसके शाखा का पूर्ण रुकावट होता है। इसमें भी ततकाल इलाज चाहिये।
अच्छा कोलेसटेरोल (Good Cholestrol) क्या हैं?
इस प्रकार के लाईपोप्रोटीन शरीर में कोलेसटेरोल को घटाता है और इससे लगे हुए कोलेसटेरोल को अच्छा कहते हैं
एच डी एल (HDL), शरीर के विभिन्न अंगों से लिपिड को, लिवर या कलेजा में ले जाता है।
एच डी एल (HDL), शरीर के विभिन्न अंगों से लिपिड को, लिवर या कलेजा में ले जाता है।
बुरा कोलेसटेरोल (Bad Cholesterol) क्या हैं?
इस प्रकार के लाईपोप्रोटीन शरीर में कोलेसटेरोल को बढाता है और इससे लगे हुए कोलेसटेरोल को बुरा कहते हैं
काईलोमाईक्रोन (Chylomicron), खाने से प्राप्त लिपिड को, शरीर के विभिन्न अंगों को ले जाता है।
वी एल डी एल (VLDL), लिवर (कलेजा) में निर्मित लिपिड को, शरीर के विभिन्न अंगों को ले जाता है।
एल डी एल (LDL), लिवर (कलेजा) में निर्मित लिपिड को, शरीर के विभिन्न अंगों को ले जाता है।
काईलोमाईक्रोन (Chylomicron), खाने से प्राप्त लिपिड को, शरीर के विभिन्न अंगों को ले जाता है।
वी एल डी एल (VLDL), लिवर (कलेजा) में निर्मित लिपिड को, शरीर के विभिन्न अंगों को ले जाता है।
एल डी एल (LDL), लिवर (कलेजा) में निर्मित लिपिड को, शरीर के विभिन्न अंगों को ले जाता है।
कोलेसटेरोल कितने तरह के होते हैं?
वैसे तो कोलेसटेरोल तो एक ही प्रकार का होता है, लेकिन किस प्रकार के लाईपोप्रोटीन के संगत में कोलेसटेरोल है, उसे अच्छा कोलेसटेरोल (Good Cholestrol) या बुरा कोलेसटेरोल (Bad Cholesterol) कहा जाता है।
अगर काईलोमाईक्रोन (Chylomicron), वी एल डी एल (VLDL) और एल डी एल (LDL) लाईपोप्रोटीन (Lipoprotein) में स्थित कोलेसटेरोल के बारे में बात किया जा रहा है तो यह आपके शरीर के विभिन्न अंगों को ले जाया जाता है। वहां पर चाहे तो यह शरीर के पालन के लिय खर्च कर दिया जाता है, या फिर जमा कर दिया जाता है। अगर अत्याधिक कोलेसटेरोल ले जाया गया, तो यह जमा करने के सीमा को पार कर जाता है। तब कोलेसटेरोल अन्यत्र जगह, जैसे कि खून के नलियों (Blood vessel) में जमा होने लगते हैं। इससे उसे संकुचित कर देते हैं (narrow) या फिर जाम कर देते हैं (block)। अंत में यह विभिन्न अंगों में खून के प्रवाह को कम करके नुकसान पहुँचाता है, जैसे कि दिल का दौरा (heart attack) या सदमा (stroke)। इसीलिय इस प्रकार के कोलेसटेरोल को बुरा कोलेसटेरोल (Bad Cholesterol) कहते हैं।
दूसरे तरफ एच डी एल लाईपोप्रोटीन (HDL Lipoprotein) में स्थित कोलेसटेरोल के बारे में बात किया जा रहा है तो यह आपके शरीर के विभिन्न अंगों से लिपिड को, लिवर या कलेजा में ले जाता है। वहां पर चाहे तो वो नया लाईपोप्रोटीन बनाने में लगा दिये जाते हैं (recycle) या बाईल या पित्त द्वारा, पैखाने में निकाल दिये जाते हैं (excreted)। अंत में एच डी एल लाईपोप्रोटीन शरीर में कोलेसटेरोल को कम करके विभिन्न बीमारीयों से बचाता है। इसीलिय इस प्रकार के कोलेसटेरोल को अच्छा कोलेसटेरोल (Good Cholestrol) कहते हैं।
अगर काईलोमाईक्रोन (Chylomicron), वी एल डी एल (VLDL) और एल डी एल (LDL) लाईपोप्रोटीन (Lipoprotein) में स्थित कोलेसटेरोल के बारे में बात किया जा रहा है तो यह आपके शरीर के विभिन्न अंगों को ले जाया जाता है। वहां पर चाहे तो यह शरीर के पालन के लिय खर्च कर दिया जाता है, या फिर जमा कर दिया जाता है। अगर अत्याधिक कोलेसटेरोल ले जाया गया, तो यह जमा करने के सीमा को पार कर जाता है। तब कोलेसटेरोल अन्यत्र जगह, जैसे कि खून के नलियों (Blood vessel) में जमा होने लगते हैं। इससे उसे संकुचित कर देते हैं (narrow) या फिर जाम कर देते हैं (block)। अंत में यह विभिन्न अंगों में खून के प्रवाह को कम करके नुकसान पहुँचाता है, जैसे कि दिल का दौरा (heart attack) या सदमा (stroke)। इसीलिय इस प्रकार के कोलेसटेरोल को बुरा कोलेसटेरोल (Bad Cholesterol) कहते हैं।
दूसरे तरफ एच डी एल लाईपोप्रोटीन (HDL Lipoprotein) में स्थित कोलेसटेरोल के बारे में बात किया जा रहा है तो यह आपके शरीर के विभिन्न अंगों से लिपिड को, लिवर या कलेजा में ले जाता है। वहां पर चाहे तो वो नया लाईपोप्रोटीन बनाने में लगा दिये जाते हैं (recycle) या बाईल या पित्त द्वारा, पैखाने में निकाल दिये जाते हैं (excreted)। अंत में एच डी एल लाईपोप्रोटीन शरीर में कोलेसटेरोल को कम करके विभिन्न बीमारीयों से बचाता है। इसीलिय इस प्रकार के कोलेसटेरोल को अच्छा कोलेसटेरोल (Good Cholestrol) कहते हैं।
शरीर के लिय कोलेसटेरोल क्यों आवश्यक है?
यह शरीर में अनेक तरह से उपयोगी है –
शरीर के सबसे छोटे इकाई या युनिट (unit) को सेल (cell, कोशिका) कहते हैं।
अरबों सेल को जोड़ कर हमारा शरीर बनता है।
हर सेल के बाहरी कवच चिकनाई युक्त होता है, जिससे कि उसका अस्तित्व रहता है। इस चिकनाई में 50 प्रतिशत कोलेसटेरोल होता है। यह खास करके हर सेल में पानी, अन्य पदार्थ और बिजली के आवहन को नियंत्रित करता है।
नसों (nerves) में यह दिमाग और शरीर के विभिन्न अंगों के बीच में सूचना का आदान प्रदान में खास महत्व रखता है।
कोलेसटेरोल, अनेक महत्वपूर्ण होरमोंस (hormones) के निर्माण में आवश्यक होता है। होरमोंस, शरीर में स्विच (switch) के जैसे काम करते हैं, मतलब कि शरीर के अनेक प्रक्रिया को शुरू या अंत (on – off) करते हैं, जैसे कि मासिक धर्म होना।
इसके अलावा कोलेसटेरोल, अनेक क्रियाशील पदार्थों का भी निर्माण करता है, जैसे कि -
सटेरोयड होरमोंस (Steroid Hormones) – यह शरीर में अनेक महत्वपूर्ण काम करता है, जैसे कि रक्तचाप और चीनी को नियंत्रित रखना।
अडरेनल होरमोंस (Adrenal Hormones) – यह शरीर में नमक – पानी का हिसाब रखता है।
विटामिन डी – जो कि हड्डीयों में केलशियम जमा करके, उसको मजबूत करता है।
बाईल एसिड जो चर्बी के पाचन में काम आता है।
कोलेसटेरोल के बिना जीवन संभव नहीं है, लेकिन अधिक कोलेसटेरोल जानलेवा भी होता है।
शरीर के सबसे छोटे इकाई या युनिट (unit) को सेल (cell, कोशिका) कहते हैं।
अरबों सेल को जोड़ कर हमारा शरीर बनता है।
हर सेल के बाहरी कवच चिकनाई युक्त होता है, जिससे कि उसका अस्तित्व रहता है। इस चिकनाई में 50 प्रतिशत कोलेसटेरोल होता है। यह खास करके हर सेल में पानी, अन्य पदार्थ और बिजली के आवहन को नियंत्रित करता है।
नसों (nerves) में यह दिमाग और शरीर के विभिन्न अंगों के बीच में सूचना का आदान प्रदान में खास महत्व रखता है।
कोलेसटेरोल, अनेक महत्वपूर्ण होरमोंस (hormones) के निर्माण में आवश्यक होता है। होरमोंस, शरीर में स्विच (switch) के जैसे काम करते हैं, मतलब कि शरीर के अनेक प्रक्रिया को शुरू या अंत (on – off) करते हैं, जैसे कि मासिक धर्म होना।
इसके अलावा कोलेसटेरोल, अनेक क्रियाशील पदार्थों का भी निर्माण करता है, जैसे कि -
सटेरोयड होरमोंस (Steroid Hormones) – यह शरीर में अनेक महत्वपूर्ण काम करता है, जैसे कि रक्तचाप और चीनी को नियंत्रित रखना।
अडरेनल होरमोंस (Adrenal Hormones) – यह शरीर में नमक – पानी का हिसाब रखता है।
विटामिन डी – जो कि हड्डीयों में केलशियम जमा करके, उसको मजबूत करता है।
बाईल एसिड जो चर्बी के पाचन में काम आता है।
कोलेसटेरोल के बिना जीवन संभव नहीं है, लेकिन अधिक कोलेसटेरोल जानलेवा भी होता है।
कोलेसटेरोल क्या है?
कोलेसटेरोल एक चिकना पदार्थ है जो शरीर के लिय आवश्यक है।
यह शरीर को अनेक तरह से मिलता है
3/4 कोलेसटेरोल, लिवर (Liver) या कलेजा में बनता है।
1/4 कोलेसटेरोल, खाने से मिलता है। शरीर में सामान्य रूप में कोलेसटेरोल पाया जाता है।
शरीर, अत्याधिक कोलेसटेरोल को, चाहे तो पैखाना के रास्ते निकाल देता है या चर्बी के रूप में जमा कर लेता है।
अत्याधिक कोलेसटेरोल या संबंधित विभिन्न प्रकार के चिकने पदार्थ नुकसानदेह होता है।
इसको हाईपर-कोलेसटेरोलेमिया (Hyper-cholesterolemia) कहते हैं।
इससे अनेक बीमारी हो सकता है, जैसे कि दिल का दौरा (Heart attack), सदमा (Stroke)
यह शरीर को अनेक तरह से मिलता है
3/4 कोलेसटेरोल, लिवर (Liver) या कलेजा में बनता है।
1/4 कोलेसटेरोल, खाने से मिलता है। शरीर में सामान्य रूप में कोलेसटेरोल पाया जाता है।
शरीर, अत्याधिक कोलेसटेरोल को, चाहे तो पैखाना के रास्ते निकाल देता है या चर्बी के रूप में जमा कर लेता है।
अत्याधिक कोलेसटेरोल या संबंधित विभिन्न प्रकार के चिकने पदार्थ नुकसानदेह होता है।
इसको हाईपर-कोलेसटेरोलेमिया (Hyper-cholesterolemia) कहते हैं।
इससे अनेक बीमारी हो सकता है, जैसे कि दिल का दौरा (Heart attack), सदमा (Stroke)
दिल का दौरा कैसे होता है?
दिल के दौरा का लक्षण
छाती में दर्द उठना - आधिकांश समय दिल के दौरा में दर्द होता है, जो कि कुछ मिनटों तक रहता है यह दर्द एक बार से अधिक बार हो सकता है यह दर्द से मरीज को तकलीफ होता है, और दर्द ऐसा लगता है कि दिल पर कोई जकड़न हो, दवाब हो, भरा हुआ हो या फिर सिर्फ दर्द हो
शरीर के उपरी भाग में कहीं भी दर्द उठाना या कष्ट होना - जैसे की पेट, जबडा, हाथ, गर्दन, पीठ
सांस लेने में तकलीफ होना
यह छाती में दर्द के साथ हो सकता है या नहीं भी हो सकता है
अन्य लक्षण हो सकते हैं, जैसे कि पसीना छूटना , चक्कर आना, उल्टी आना
छाती में दर्द उठना - आधिकांश समय दिल के दौरा में दर्द होता है, जो कि कुछ मिनटों तक रहता है यह दर्द एक बार से अधिक बार हो सकता है यह दर्द से मरीज को तकलीफ होता है, और दर्द ऐसा लगता है कि दिल पर कोई जकड़न हो, दवाब हो, भरा हुआ हो या फिर सिर्फ दर्द हो
शरीर के उपरी भाग में कहीं भी दर्द उठाना या कष्ट होना - जैसे की पेट, जबडा, हाथ, गर्दन, पीठ
सांस लेने में तकलीफ होना
यह छाती में दर्द के साथ हो सकता है या नहीं भी हो सकता है
अन्य लक्षण हो सकते हैं, जैसे कि पसीना छूटना , चक्कर आना, उल्टी आना
बल्ड प्रेशर दिन में कब नपवाना चाहिये?
वैसे तो दिन में कभी भी बल्ड प्रेशर नापा जा सकता है, लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिये कि वो अनजाने में ही अधिक या कम परिणाम न दे।
चाय, कोफी, धूम्रपान, दौड़ने या व्यायाम के 1 घंटे से अधिक समय के अंतराल के बाद बल्ड प्रेशर नपवाना चाहिये, अन्यथा इनके बाद आपको अधिक रक्तचाप होने का परिणाम निकल सकता है।
सुबह में कोई भी बल्ड प्रेशर कम करनेवाला दवा लेने से पहले जांच करवायें, अन्यथा इनके बाद आपको कम रक्तचाप होने का परिणाम निकल सकता है।
अगर आप जांच केन्द्र जाते हैं, तो कमरे में कम से कम दस मिनट बैठने के बाद शांत होने पर बल्ड प्रेशर नपवाना चाहिये, अन्यथा इनके बाद आपको अधिक रक्तचाप होने का परिणाम निकल सकता है।
अगर कोई शक है तो दोनों भुजा में बल्ड प्रेशर नपवाना चहिये।
अगर कोई शक है तो डाक्टर से भेंट करने से पहले और बाद में, दोनों स्थिती में जांच करवाना चाहिये।
चाय, कोफी, धूम्रपान, दौड़ने या व्यायाम के 1 घंटे से अधिक समय के अंतराल के बाद बल्ड प्रेशर नपवाना चाहिये, अन्यथा इनके बाद आपको अधिक रक्तचाप होने का परिणाम निकल सकता है।
सुबह में कोई भी बल्ड प्रेशर कम करनेवाला दवा लेने से पहले जांच करवायें, अन्यथा इनके बाद आपको कम रक्तचाप होने का परिणाम निकल सकता है।
अगर आप जांच केन्द्र जाते हैं, तो कमरे में कम से कम दस मिनट बैठने के बाद शांत होने पर बल्ड प्रेशर नपवाना चाहिये, अन्यथा इनके बाद आपको अधिक रक्तचाप होने का परिणाम निकल सकता है।
अगर कोई शक है तो दोनों भुजा में बल्ड प्रेशर नपवाना चहिये।
अगर कोई शक है तो डाक्टर से भेंट करने से पहले और बाद में, दोनों स्थिती में जांच करवाना चाहिये।
बल्ड प्रेशर
बल्ड प्रेशर नपवाते समय कैसे बैठना चाहिये?
बल्ड प्रेशर आपके खून के रक्तचाप को कहते हैं। यह कोई एक नंबर नहीं होता है, कि हर बार आपको वही परिणाम मिलेगा। किंतु रक्तचाप अनेकों कारण से उपर या नीचे हो सकता है। इस कारण से किसी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप का निदान निकालने से पहले उसका रक्तचाप बार-बार नापा जाता है।
अगले बार आप जब बल्ड प्रेशर नपवाने जायें तो आराम से कुर्सी पर बैठें। अपना पीठ को कुर्सी से लगा कर रखें। अपना पैर जमीन पर समतल रखें। अपना हाथ को अपने दिल के बराबर में सहारा देकर सीधा रखें। इससे आपका बल्ड प्रेशर का सही अनुमान लगेगा।
दूसरे तरफ अगर आप जांच करने वाले बेड पर बैठ कर या लेटकर या अपना कुहनी मोड़कर, अपना बल्ड प्रेशर का जांच करवाते हैं, तो यह गलत करते हैं। इससे आपका रक्तचाप का परिणाम अधिक आयेगा, जो कि वास्तव में नहीं हो सकता है। इसीलिये अगर आपको अधिक रक्तचाप बताया गया है, तो यह ध्यान रखें कि आपका बल्ड प्रेशर सही तरह से लिया गया है। अगर नहीं तो फिर से जांच करवायें।
रक्तचाप या ब्लड प्रेशर रक्तवाहिनियों में बहते रक्त द्वारा वाहिनियों की दीवारों पर डाले गए दबाव को कहते हैं। धमनी वह नलिका होती हैं जो रक्त को हृदय से शरीर के विभिन्न हिस्सों तक ले जाती हैं। हृदय रक्त को धमनियों में पंप करता है। किसी भी व्यक्ति का रक्तचाप सिस्टोलिक और डायस्टोलिक रक्तचाप के रूप में जाना जाता है। जैसे 120/80 सिस्टोलिक अर्थात ऊपर की संख्या धमनियों में दाब को दर्शाती है। इसमें हृदय की मांसपेशियाँ संकुचित होकर धमनियों में रक्त को पंप करती है।
डायस्टोलिक रक्तचाप अर्थात नीचे वाली संख्या धमनियों में उस दाब को दर्शाती है जब संकुचन के बाद हृदय की मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। रक्तचाप उस समय अधिक होता है जब हृदय रक्त को धमनियों में पंप करता है। एक स्वस्थ व्यक्ति का सिस्टोलिक रक्तचाप 90 और 120 मिलीमीटर के बीच होता है। सामान्य डायस्टोलिक रक्तचाप 60 से 80 मिमी के बीच होता है। रक्तचाप संबंधी दो प्रकार की समस्याएँ देखने में आती हैं- एक निम्न रक्तचाप और दूसरी उच्च रक्तचाप।
निम्न रक्तचाप
निम्न रक्तचाप वह दाब है जिससे धमनियों और नसों में रक्त का प्रवाह कम होने के लक्षण या संकेत दिखाई देते हैं। जब रक्त का प्रवाह काफी कम होता है तो मस्तिष्क, हृदय तथा गुर्दे जैसी महत्वपूर्ण इंद्रियों में ऑक्सीजन और पौष्टिक पदार्थ नहीं पहुंच पाते। इससे यह अंग सामान्य कामकाज नहीं कर पाते और स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त होने की आशंका बढ़ जाती है।
उच्च रक्तचाप के विपरीत निम्न रक्तचाप की पहचान लक्षण और संकेतों से होती है, न कि विशिष्ट दाब के आधार पर। किसी मरीज का रक्तचाप 90/50 होता है लेकिन उसमें निम्न रक्तचाप के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं। यदि किसी को निम्न रक्तचाप के कारण चक्कर आता हो या मितली आती हो या खड़े होने पर बेहोश होकर गिर पड़ता हो तो उसे आर्थोस्टेटिक उच्च रक्तचाप कहते हैं।
खड़े होने पर निम्न रक्तचाप के कारण होने वाले प्रभाव को सामान्य व्यक्ति जल्द ही काबू कर लेता है। लेकिन जब पर्याप्त रक्तचाप के कारण चक्रीय धमनी में रक्त की आपूर्ति नहीं होती है तो व्यक्ति को सीने में दर्द हो सकता है या दिल का दौरा पड़ सकता है। जब गुर्दों में अपर्याप्त मात्रा में खून की आपूर्ति होती है तो गुर्दे शरीर से यूरिया और क्रिएटिनिन जैसे अपशिष्टों को निकाल नहीं पाते, जिससे रक्त में इनकी मात्रा अधिक हो जाती है।
उच्च रक्तचाप
जब मरीज का रक्तचाप 130/80 से ऊपर हो तो उसे उच्च रक्तचाप या हाइपरटेंशन कहते हैं। इसका अर्थ है कि धमनियों में उच्च तनाव है। उच्च रक्तचाप का अर्थ यह नहीं है कि अत्यधिक भावनात्मक तनाव हो। भावनात्मक तनाव व दबाव अस्थायी तौर पर रक्त के दाब को बढ़ा देते हैं। सामान्यतः रक्तचाप 120/80 से कम होना चाहिए। इसके बाद 139/89 के बीच का रक्त का दबाव प्री-हाइपरटेंशन कहलाता है और 140/90 या उससे अधिक का रक्तचाप उच्च समझा जाता है। उच्च रक्तचाप से हृदय रोग, गुर्दे की बीमारी, धमनियों का सख्त होना, आँखें खराब होने और मस्तिष्क खराब होने का जोखिम बढ़ जाता है।
नियंत्रित रखना जरूरी
उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखना जरूरी है। इससे सभी अंग सलामत रहते हैं। उच्च रक्तचाप धीमे जहर की तरह काम करता है। इसके कारण धीरे-धीरे सभी अंग खराब होते जाते हैं। उच्च रक्तचाप के मरीजों की विशेष देखभाल और जाँच द्वारा दिल के दौरे की आशंका एक चौथाई कम हो सकती है। वहीं मस्तिष्काघात की भी संभावना भी 40 प्रतिशत कम हो सकती है।
रक्तचाप
ND
जाँच कराने के पहले
डॉक्टर के पास अपना बीपी की जाँच के लिए पहुँचने के बाद कम से कम पाँच मिनट के लिए आराम करने के बाद ही अपना रक्तचाप की जाँच कराएँ। लंबा चलने, सीढ़ियाँ चढ़ने, दौड़ने-भागने के तुरंत बाद जाँच कराने पर रक्तदाब बढ़ा हुआ आता है। जाँच के आधा घंटा पहले से चाय, कॉफी, कोला ड्रिंक और धूम्रपान नहीं करना चाहिए। इनके सेवन से रक्तदाब अगले 15-20 मिनट के लिए बढ़ जाता है।
लक्षण
चक्कर आना
लगातार सिरदर्द होना
साँस लेने में तकलीफ
नींद न आना
कम मेहनत करने पर साँस फूलना
नाक से खून आना।
बल्ड प्रेशर आपके खून के रक्तचाप को कहते हैं। यह कोई एक नंबर नहीं होता है, कि हर बार आपको वही परिणाम मिलेगा। किंतु रक्तचाप अनेकों कारण से उपर या नीचे हो सकता है। इस कारण से किसी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप का निदान निकालने से पहले उसका रक्तचाप बार-बार नापा जाता है।
अगले बार आप जब बल्ड प्रेशर नपवाने जायें तो आराम से कुर्सी पर बैठें। अपना पीठ को कुर्सी से लगा कर रखें। अपना पैर जमीन पर समतल रखें। अपना हाथ को अपने दिल के बराबर में सहारा देकर सीधा रखें। इससे आपका बल्ड प्रेशर का सही अनुमान लगेगा।
दूसरे तरफ अगर आप जांच करने वाले बेड पर बैठ कर या लेटकर या अपना कुहनी मोड़कर, अपना बल्ड प्रेशर का जांच करवाते हैं, तो यह गलत करते हैं। इससे आपका रक्तचाप का परिणाम अधिक आयेगा, जो कि वास्तव में नहीं हो सकता है। इसीलिये अगर आपको अधिक रक्तचाप बताया गया है, तो यह ध्यान रखें कि आपका बल्ड प्रेशर सही तरह से लिया गया है। अगर नहीं तो फिर से जांच करवायें।
रक्तचाप या ब्लड प्रेशर रक्तवाहिनियों में बहते रक्त द्वारा वाहिनियों की दीवारों पर डाले गए दबाव को कहते हैं। धमनी वह नलिका होती हैं जो रक्त को हृदय से शरीर के विभिन्न हिस्सों तक ले जाती हैं। हृदय रक्त को धमनियों में पंप करता है। किसी भी व्यक्ति का रक्तचाप सिस्टोलिक और डायस्टोलिक रक्तचाप के रूप में जाना जाता है। जैसे 120/80 सिस्टोलिक अर्थात ऊपर की संख्या धमनियों में दाब को दर्शाती है। इसमें हृदय की मांसपेशियाँ संकुचित होकर धमनियों में रक्त को पंप करती है।
डायस्टोलिक रक्तचाप अर्थात नीचे वाली संख्या धमनियों में उस दाब को दर्शाती है जब संकुचन के बाद हृदय की मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। रक्तचाप उस समय अधिक होता है जब हृदय रक्त को धमनियों में पंप करता है। एक स्वस्थ व्यक्ति का सिस्टोलिक रक्तचाप 90 और 120 मिलीमीटर के बीच होता है। सामान्य डायस्टोलिक रक्तचाप 60 से 80 मिमी के बीच होता है। रक्तचाप संबंधी दो प्रकार की समस्याएँ देखने में आती हैं- एक निम्न रक्तचाप और दूसरी उच्च रक्तचाप।
निम्न रक्तचाप
निम्न रक्तचाप वह दाब है जिससे धमनियों और नसों में रक्त का प्रवाह कम होने के लक्षण या संकेत दिखाई देते हैं। जब रक्त का प्रवाह काफी कम होता है तो मस्तिष्क, हृदय तथा गुर्दे जैसी महत्वपूर्ण इंद्रियों में ऑक्सीजन और पौष्टिक पदार्थ नहीं पहुंच पाते। इससे यह अंग सामान्य कामकाज नहीं कर पाते और स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त होने की आशंका बढ़ जाती है।
उच्च रक्तचाप के विपरीत निम्न रक्तचाप की पहचान लक्षण और संकेतों से होती है, न कि विशिष्ट दाब के आधार पर। किसी मरीज का रक्तचाप 90/50 होता है लेकिन उसमें निम्न रक्तचाप के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं। यदि किसी को निम्न रक्तचाप के कारण चक्कर आता हो या मितली आती हो या खड़े होने पर बेहोश होकर गिर पड़ता हो तो उसे आर्थोस्टेटिक उच्च रक्तचाप कहते हैं।
खड़े होने पर निम्न रक्तचाप के कारण होने वाले प्रभाव को सामान्य व्यक्ति जल्द ही काबू कर लेता है। लेकिन जब पर्याप्त रक्तचाप के कारण चक्रीय धमनी में रक्त की आपूर्ति नहीं होती है तो व्यक्ति को सीने में दर्द हो सकता है या दिल का दौरा पड़ सकता है। जब गुर्दों में अपर्याप्त मात्रा में खून की आपूर्ति होती है तो गुर्दे शरीर से यूरिया और क्रिएटिनिन जैसे अपशिष्टों को निकाल नहीं पाते, जिससे रक्त में इनकी मात्रा अधिक हो जाती है।
उच्च रक्तचाप
जब मरीज का रक्तचाप 130/80 से ऊपर हो तो उसे उच्च रक्तचाप या हाइपरटेंशन कहते हैं। इसका अर्थ है कि धमनियों में उच्च तनाव है। उच्च रक्तचाप का अर्थ यह नहीं है कि अत्यधिक भावनात्मक तनाव हो। भावनात्मक तनाव व दबाव अस्थायी तौर पर रक्त के दाब को बढ़ा देते हैं। सामान्यतः रक्तचाप 120/80 से कम होना चाहिए। इसके बाद 139/89 के बीच का रक्त का दबाव प्री-हाइपरटेंशन कहलाता है और 140/90 या उससे अधिक का रक्तचाप उच्च समझा जाता है। उच्च रक्तचाप से हृदय रोग, गुर्दे की बीमारी, धमनियों का सख्त होना, आँखें खराब होने और मस्तिष्क खराब होने का जोखिम बढ़ जाता है।
नियंत्रित रखना जरूरी
उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखना जरूरी है। इससे सभी अंग सलामत रहते हैं। उच्च रक्तचाप धीमे जहर की तरह काम करता है। इसके कारण धीरे-धीरे सभी अंग खराब होते जाते हैं। उच्च रक्तचाप के मरीजों की विशेष देखभाल और जाँच द्वारा दिल के दौरे की आशंका एक चौथाई कम हो सकती है। वहीं मस्तिष्काघात की भी संभावना भी 40 प्रतिशत कम हो सकती है।
रक्तचाप
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जाँच कराने के पहले
डॉक्टर के पास अपना बीपी की जाँच के लिए पहुँचने के बाद कम से कम पाँच मिनट के लिए आराम करने के बाद ही अपना रक्तचाप की जाँच कराएँ। लंबा चलने, सीढ़ियाँ चढ़ने, दौड़ने-भागने के तुरंत बाद जाँच कराने पर रक्तदाब बढ़ा हुआ आता है। जाँच के आधा घंटा पहले से चाय, कॉफी, कोला ड्रिंक और धूम्रपान नहीं करना चाहिए। इनके सेवन से रक्तदाब अगले 15-20 मिनट के लिए बढ़ जाता है।
लक्षण
चक्कर आना
लगातार सिरदर्द होना
साँस लेने में तकलीफ
नींद न आना
कम मेहनत करने पर साँस फूलना
नाक से खून आना।
क्या आप जानते हैं?
क्या आप जानते हैं?
सभी महिलाओं को
हर दिन 400 मिक्रोग्राम (microgram)
फोलिक एसिड (Folic Acid)
लेना चहिये।
सभी महिलाओं को
हर दिन 400 मिक्रोग्राम (microgram)
फोलिक एसिड (Folic Acid)
लेना चहिये।
ब्रेस्ट कैंसर
यूं तो ब्रेस्ट कैंसर किसी भी उम्र भी हो सकता है, लेकिन खासतौर पर 40 साल की उम्र के बाद इसका खतरा ज्यादा रहता है। ऐसे में साल में एक बार चेकअप करवाते रहने के अलावा और भी बातों का ध्यान रखना जरूरी है।बदलते रहन-सहन के इस दौर में भारत में ब्रेस्ट कैंसर तेजी से पांव पसार रहा है। हालांकि इसे शुरुआती स्टेज पर पहचानना मुश्किल नहीं है और अगर इसका पता समय पर लग जाए, तो इस पर काफी हद तक इस पर काबू पाया जा सकता है।कब करवाएं टेस्ट-अगर आप 40 या इससे ज्यादा उम्र की हैं, तो साल में एक बार ब्रेस्ट एक्सरे जरूर करवाएं।- ब्रेस्ट कैंसर की एक वजह आनुवंशिक भी होती है। अगर आपकी मम्मी को यह प्रॉब्लम रही है, तो इस मामले में आपको पूरी तरह सतर्क रहने की जरूरत है। ऐसे में आपको 40 साल से पहले से ही इसका परीक्षण करवाना शुरू कर देना चाहिए।- अगर आपके रहन-सहन में सिगरेट, स्मोकिंग, पान मसाला जैसी चीजें शामिल हैं, तो ब्रेस्ट कैंसर होने के चांस ज्यादा हो जाते हैं।
इसलिए आपको जल्दी से जल्दी ब्रेस्ट एक्सरे करवाना शुरू कर देना चाहिए।- छाती में किसी भी तरह की गांठ को हल्के तौर पर न लें और तुरंत डॉक्टर से ब्रेस्ट कैंसर का चेकअप करवाएं।
एक्सरे से स्तन कैंसर का पता शुरुआती स्टेज में ही लगाया जा सकता है। इस जांच से यह भी पता चल जाता है कि कैंसर ब्रेस्ट के किस हिस्से में है।
अगर आपको ब्रेस्ट हार्ड महसूस हो रहा हो और सूजन की वजह से आप असहज महसूस कर रही हों, तो ऐसी स्थिति में तुरंत एक्सरे करवाएं।
पीरियड्स से पहले के एक हफ्ते में एक्सरे करवाना अवॉइड करें।- टेस्ट के दिन डियॉड्रेंट या परफ्यूम ना ही लगाएं। इस तरह की चीजें एक्सरे पिक्चर में वाइट स्पॉट लाती हैं, जिससे रिपोर्ट सही नहीं आती। अगर आपको ब्रेस्ट में कोई दिक्कत महसूस हो रही हो, तो एक्सरे से पहले ही डॉक्टर को बता दें।
जो महिलाएं प्रेग्नंट हैं या ब्रेस्ट फीडिंग करवाती हैं, उनको भी ब्रेस्ट से जुड़े टेस्ट करवाते रहने चाहिए।क्या करेंअगर आपको डॉक्टर की तरफ से ब्रेस्ट चेंज करने को कह दिया गया है, तो डॉक्टर के कहे मुताबिक ही स्टेप बाई स्टेप टेस्ट करवाते रहें। साथ ही, दवाइयां भी समय के मुताबिक लेना न भूलें। इस दौरान अगर स्किन का एक जगह इकट्ठा होना, सूजन, त्वचा में जलन, निपल में दर्द होना या उनका मुड़ना, निपल व ब्रेस्ट की स्किन का हिस्सा लाल होना, ब्रेस्ट के साइज में अंतर आना वगैरह में से कुछ भी महसूस करें, तो फौरन डॉक्टर से चेकअप करवाएं।ट्रीटमंटकैंसर वाले ब्रेस्ट का इलाज पर डिपेंड करता है कि कैंसर किस हद तक बढ़ गया है।
ज्यादा गंभीर स्थिति में ब्रेस्ट को पूरी तरह हटाना तक पड़ सकता है। शुरुआती स्थिति में पता चल जाने पर ब्रेस्ट के प्रभावित हिस्से को हटाकर भी काम चलाया जा सकता है।
इसके लिए सर्जरी, कीमोथेरपी, रेडियो थेरपी, हॉर्मोनल थेरपी वगैरह से इलाज होता है।
सर्जरी में ब्रेस्ट को पूरी तरह निकाल दिया जाता है, जबकि अन्य स्थितियों में दूसरी विधियों द्वारा इलाज किया जाता है।
इसलिए आपको जल्दी से जल्दी ब्रेस्ट एक्सरे करवाना शुरू कर देना चाहिए।- छाती में किसी भी तरह की गांठ को हल्के तौर पर न लें और तुरंत डॉक्टर से ब्रेस्ट कैंसर का चेकअप करवाएं।
एक्सरे से स्तन कैंसर का पता शुरुआती स्टेज में ही लगाया जा सकता है। इस जांच से यह भी पता चल जाता है कि कैंसर ब्रेस्ट के किस हिस्से में है।
अगर आपको ब्रेस्ट हार्ड महसूस हो रहा हो और सूजन की वजह से आप असहज महसूस कर रही हों, तो ऐसी स्थिति में तुरंत एक्सरे करवाएं।
पीरियड्स से पहले के एक हफ्ते में एक्सरे करवाना अवॉइड करें।- टेस्ट के दिन डियॉड्रेंट या परफ्यूम ना ही लगाएं। इस तरह की चीजें एक्सरे पिक्चर में वाइट स्पॉट लाती हैं, जिससे रिपोर्ट सही नहीं आती। अगर आपको ब्रेस्ट में कोई दिक्कत महसूस हो रही हो, तो एक्सरे से पहले ही डॉक्टर को बता दें।
जो महिलाएं प्रेग्नंट हैं या ब्रेस्ट फीडिंग करवाती हैं, उनको भी ब्रेस्ट से जुड़े टेस्ट करवाते रहने चाहिए।क्या करेंअगर आपको डॉक्टर की तरफ से ब्रेस्ट चेंज करने को कह दिया गया है, तो डॉक्टर के कहे मुताबिक ही स्टेप बाई स्टेप टेस्ट करवाते रहें। साथ ही, दवाइयां भी समय के मुताबिक लेना न भूलें। इस दौरान अगर स्किन का एक जगह इकट्ठा होना, सूजन, त्वचा में जलन, निपल में दर्द होना या उनका मुड़ना, निपल व ब्रेस्ट की स्किन का हिस्सा लाल होना, ब्रेस्ट के साइज में अंतर आना वगैरह में से कुछ भी महसूस करें, तो फौरन डॉक्टर से चेकअप करवाएं।ट्रीटमंटकैंसर वाले ब्रेस्ट का इलाज पर डिपेंड करता है कि कैंसर किस हद तक बढ़ गया है।
ज्यादा गंभीर स्थिति में ब्रेस्ट को पूरी तरह हटाना तक पड़ सकता है। शुरुआती स्थिति में पता चल जाने पर ब्रेस्ट के प्रभावित हिस्से को हटाकर भी काम चलाया जा सकता है।
इसके लिए सर्जरी, कीमोथेरपी, रेडियो थेरपी, हॉर्मोनल थेरपी वगैरह से इलाज होता है।
सर्जरी में ब्रेस्ट को पूरी तरह निकाल दिया जाता है, जबकि अन्य स्थितियों में दूसरी विधियों द्वारा इलाज किया जाता है।
ekupresar
kan ke ek vishesh bindu ko stimulot karne ki ek vishesh padyati ka vikash kar saikron asadhya rogon se dactar piush trivedi ne anekon rogion ko thik kiya hai.
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